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DOI: https://doi.org/10.63345/ijrhs.net.v13.i8.9
कुवर मंगेश प्रल्हाद
अनुसंधानार्थी
महाराजा अग्रसेन हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय
उत्तराखंड
डॉ. सुचिता उपाध्याय
मार्गदर्शक
महाराजा अग्रसेन हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय
उत्तराखंड
सारांश
दलित स्त्रियों के मुद्दे भारतीय समाज की जटिल सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं से गहराई से जुड़े हुए हैं। मराठी पत्रकारिता ने इन मुद्दों को उजागर करने और सामाजिक विमर्श में स्थान दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह शोधपत्र दलित स्त्रियों की समस्याओं — जैसे जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, आर्थिक शोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच — पर मराठी पत्रकारिता के दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है। अध्ययन में यह स्पष्ट होता है कि मराठी अखबारों, पत्रिकाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने दलित स्त्रियों की आवाज़ को मुख्यधारा की पत्रकारिता में जगह दी है। विशेष रूप से डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों से प्रेरित पत्रकारिता ने न केवल अन्याय के मुद्दों को सामने रखा है, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में संवाद स्थापित करने का भी प्रयास किया है। साथ ही, स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के अंतर्संबंध को समझने में यह पत्रकारिता एक सेतु का कार्य करती है।
हालांकि, यह भी देखा गया है कि मुख्यधारा के कई मंचों पर दलित स्त्रियों की समस्याओं को अभी भी हाशिए पर रखा जाता है या सतही रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में, दलित स्त्रियों की आवाज़ को सशक्त बनाने के लिए वैकल्पिक मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता के महत्व को भी रेखांकित किया गया है। यह शोधपत्र इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि मराठी पत्रकारिता में दलित स्त्रियों के मुद्दों की कवरेज ने सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की लड़ाई को मजबूत आधार प्रदान किया है, लेकिन इस दिशा में और गहराई, संवेदनशीलता और सतत प्रयासों की आवश्यकता है ताकि समाज में वास्तविक परिवर्तन लाया जा सके।
मुख्य शब्द
दलित स्त्रियाँ, मराठी पत्रकारिता, सामाजिक न्याय, लैंगिक असमानता, अधिकार जागरूकता
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