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DOI: https://doi.org/10.63345/ijrhs.net.v8.i4.1
डॉ गीता दुबे
सहायक प्राध्यापक ( हिंदी)
ब्रह्मावर्त पी•जी• कालेज मंधना, कानपुर नगर, उत्तर प्रदेश,
छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय,कानपुर नगर
भूमिका— हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में महादेवी वर्मा का स्थान अत्यंत विशिष्ट और बहुआयामी है। उन्हें प्रायः छायावाद की “चतुर्थ स्तंभ” के रूप में जाना जाता है, परंतु उनका साहित्यिक योगदान केवल छायावादी काव्य तक सीमित नहीं रहा। उनकी रचनात्मक यात्रा आत्मानुभूति, विरह, करुणा और प्रकृति-बोध से आरंभ होकर क्रमशः सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना और करुणा के व्यापक फलक तक विस्तृत होती चली गई। यही विकास उनकी साहित्यिक साधना को एक गहरे मानवीय संदर्भ से जोड़ता है।
महादेवी वर्मा का प्रारंभिक काव्य व्यक्तित्व की आंतरिक वेदना, अकेलेपन और आत्मसंवेदना से प्रेरित दिखाई देता है। उनकी कविताओं में नारी मन की कोमल अनुभूतियाँ, पीड़ा और सौंदर्य चेतना प्रतीकात्मक भाषा में अभिव्यक्त होती हैं। यह आत्मसंवेदना केवल व्यक्तिगत दुख तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे समूची मानव पीड़ा की संवेदना में रूपांतरित हो जाती है। इसी परिवर्तन के माध्यम से उनका काव्य आत्मकेंद्रित भावभूमि से निकलकर सामाजिक सरोकारों की ओर अग्रसर होता है।
कालांतर में महादेवी वर्मा की रचनाओं में सामाजिक करुणा, शोषितों के प्रति सहानुभूति, नारी की अस्मिता और मानवीय गरिमा के प्रश्न स्पष्ट रूप से उभरने लगते हैं। उनके गद्य लेखन, संस्मरणों और निबंधों में यह परिवर्तन विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता है, जहाँ वे समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्तियों और जीव-जंतुओं तक के प्रति गहरी करुणा व्यक्त करती हैं। यह करुणा भावुकता नहीं, बल्कि नैतिक चेतना और मानवीय उत्तरदायित्व से जुड़ी हुई है।
अतः महादेवी वर्मा की साहित्यिक यात्रा को आत्मसंवेदना से सामाजिक करुणा तक के विकासात्मक क्रम में समझना न केवल उनके साहित्य को समग्रता में देखने का अवसर देता है, बल्कि हिंदी साहित्य में संवेदना के रूपांतरण की प्रक्रिया को भी स्पष्ट करता है। यह अध्ययन उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के वैचारिक विस्तार और सामाजिक प्रतिबद्धता को समझने की एक सार्थक भूमिका प्रस्तुत करता है।
बीज शब्द— महादेवी वर्मा, छायावाद, आत्मसंवेदना, सामाजिक करुणा, नारी चेतना, मानवीय संवेदना, काव्य और गद्य, साहित्यिक विकास
संदर्भ सूची
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