डॉ. मोनू सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी,
चै॰ चरण सिंह राजकीय महाविद्यालय,
छपरौली, बागपत
लीलाधर जगूड़ी समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनके अद्यतन 13 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कविता समकालीन स्थितियों-परिस्थितियों का बहुत प्रामाणिक विश्लेषण करती है। लीलाधर जगूड़ी की कविता में जितना राजनैतिक प्रखरता विद्यमान है, उतनी ही सुदृढ़ लोक की उपस्थिति भी है। जगूड़ी की कविता लोकगीत, लोकनृत्य, लोककलाओं एवं पर्वतीय अंचल की बहुत प्रामाणित अभिव्यक्ति करती है। इस शोध पत्र में हम लीलाधर जगूड़ी की कविता में लोकगीतों के विविध सन्दर्भों का विश्लेषण करेंगे। लोकगीतों का विश्लेषण करने से पूर्व हमें लोकगीतों का अर्थ, परिभाषा एवं इसके स्वरूप को समझना श्रेयस्कर होगा।
‘लोकगीत’ अंग्रेजी के ‘फोक साँग’ का पर्याय है। हिन्दी साहित्य कोश में इसके भिन्न-भिन्न अर्थ दिए गए हैं। लोक में प्रचलित गीत, लोक निर्मित गीत, लोक विषयक गीत, इन तीनों अर्थों में ही लोकगीत का अर्थ लोक में रचे-बसे प्रचलित गीतों से लिया जाता है। इन गीतों का रचयिता कोई व्यक्ति विशेष न होकर समूचा लोक ही होता है। लोकगीत लोक में बसे जन सामान्य की सहज मनःस्थिति के अकृत्रिम चित्र हैं। डॉ. सरनाम सिंह ने लोकगीत की परिभाषा देते हुए लिखा है- ‘‘लोकगीत किसी व्यक्ति विशेष की निधि नहीं होता है। इसकी सृष्टि में लोक-रूचि, लोक-भावना, लोक रीति, लोक-नीति का भोग रहता है। इसके निर्माण के पीछे लोक-जीवन, लोक-समाज, लोक संस्कृति का पूर्ण चित्रण रहता है।’’[i]
सन्दर्भ सूची
- डॉ. सरनाम सिंह- साहित्य सिद्धान्त और समीक्षा, पृ॰सं॰ 18
- लीलाधर जगूड़ी- भय भी शक्ति देता है, पृ॰सं॰ 115
- अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी- बिसुरते लोकगीत, जनसत्ता 15 मई 2016
- अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी- जनचेतना की अभिव्यक्ति, जनसत्ता 10 मई 2016
- लीलाधर जगूड़ी- भय भी शक्ति देता है, पृ॰सं॰ 116