डॉ राजेश कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
राजकीय महाविद्यालय,
बी॰बी॰ नगर, बुलन्दशहर
जीवन के शाश्वत सत्यों में परिवर्तन एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक है। जीवन-जगत् में समयानुरूप सभी कुछ परिवर्तनशील जान पड़ता है। यह अवश्य है कि कुछ सन्दर्भ में परिवर्तन की गति अत्यंत धीमी रहती है जिसकी अनुभूति बहुत सजग संचेतना के द्वारा ही की जा सकती है जबकि कुछ क्षेत्रों में परिवर्तन की गति बड़ी तीव्र होती है। सभ्यता व संस्कृति को प्रायः धीमी गति से परिवर्तित होने वाली श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि ये मानव की हजारों वर्षों की विकास यात्रा में शनैः शनैः स्वरूप ग्रहण करती हुई आगे बढ़ती है। वर्तमान उत्तर-आधुनिक दौर में विज्ञान एवं तकनीकी क्रांति के फलस्वरूप सांस्कृतिक क्षेत्र में भी परिवर्तन की गति में तीव्रता आई है, जिससे भारतीय समाज भी अछूता नहीं रहा है। परिवर्तन की इस बयार ने हमारी हजारों वर्ष की संचित निधि-मूल्य, परम्परा, आस्था एवं पारिवारिक ढाँचे की बुनियाद को ही हिला कर रख दिया है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक व्यवस्था में भी तीव्र परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। इन्हीं परिवर्तनों में से एक है समाज में वृद्धों की स्थिति में आए बदलाव। भारतीय समाज व कला जगत् में वृद्धों की स्थिति को लेकर आए तीव्र बदलावों को रेखांकित करते हुए हिन्दी सिने जगत् का एक उदाहरण प्रासंगिक जान पड़ता है। ‘‘70 के दशक की दीवार फिल्म में नायक छोटे भाई को नीचा दिखने के लिए कहता है ‘मेरे पास कार है, बँगला है, बैंक बैलेंस है, प्रोपर्टी है, तुम्हारे पास क्या है?
संदर्भ सूची
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- देशजमन डॉटब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम 18 जून 2019
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